May 7, 2011
अन्ना हज़ारे और 1857 की क्रांति।
दस मई सन्
1857 भरतीय इतिहास का क्रांतिक दिवस है। इस दिन साम्रज्यवादी अंग्रेजी शासन के विरोध में भरतीय जनमानस ने हथियार उठाए। व्यापक स्तर पर गोरों का मान मर्दन किया। मगर संगठन का अभाव रहा। बर्तानिया सरकार के विरोध का एकमेव कारण राष्ट्रवाद नहीं था। अन्य अनेक कारण भी थे। अत: लडाई आर पार की ना हो सकी। तथापि अंग्रेजों के मन में एक डर तो बैठा ही, कि भारतीय इतने भोले नहीं जितना वे उन्हें समझ बैठे थे। तद्नुरूप उन्होंने अपनी प्रशासकीय नीतियों में त्वरित फेर बदल किये।
भारतीय जनमानस आज पुन: उद्वेलित है। सार्वजनिक जीवन में भृष्टाचार को ले कर। यूं तो कदाचार लगभग उतना ही स्वीकृत हो चुका है जितना एक कुरूप जीवन साथी, मगर सहसा दोनो के बीच एक दीवार खडी हो गई है- अन्ना हजारे। गोया कि अंग्रेज अच्छे खासे रम चुके थे भारत में जब सैनिक, सन्यासी, आमजन, सभी हाथ धो कर उनके पीछे पड़ गए। जब से अन्ना हजारे का लोकार्पण हुआ है, देश में एक नई उर्जा का संचार हुआ है। क्या यह घटना भी 1857 के विद्रोह की भांति एक अप्रत्याशित घटना बन कर रह जाएगी? जिसे सामा्रज्यवादी ताकतें कुचलने में कामयाब रहीं? जिसे आशातीत सफलता तब से ठीक नौ दशक बाद ही मिली? प्रश्न का उत्तर राष्ट्रवाद में छुपा है। क्या अन्ना हज़ारे को मिल रहे समर्थन का एकमेव आधार राष्ट्रवाद है? इन समर्थकों में सदाचारी कितने हैं? क्या इनमें भी तमाशाईयों की, मौकापरस्तों की वही भीड तो नहीं जो सन् सत्तावन के विद्रोह को ले डूबी
यह एक शाश्वत सत्य है कि हर बडे परिवर्तन का आरम्भ मानस पटल से होता है। अंतरमन के भाव अधिक समय तक छुपे नहीं रहते। इनके प्रकट होने का माध्यम कुछ भी हो सकता है। ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा भारतीय रजवाडों को अपने साम्राज्य में मिलाना, भारतीय सैनिकों एवं आम नागरिकों की उपेक्षा करना, अंग्रेज़ी शिक्षा एवं धर्म परिवर्तन को बढ़ावा देना; इन सब का मिला जुला परिणाम था 1857 का विप्लव। वहीं अन्ना हज़ारे प्रगतिशील भारत वह दुखती रग है जो 63 साल के प्रजातंत्र में उपेक्षित रही है। इमानदारी की रग। सत्तर के दशक में मनोज कुमार, मिस्टर भारत अभिनीत एक फिल्म आई थी- बेइमान। सुपर हिट थी। इंटरवल में एक दर्शक ने आवाज़ लगाई- बोलो बेइमान की…..। प्रत्युत्तर में पूरा हॉल गूंज उठा-जय!!! हास्य का अच्छा अंदाज़ था। मगर कालांतर में यह हास्य हकीकत बनता चला गया। बेइमान बलवान होते गए, भारत इनका बोझ ढोता रहा। यह त्रासदी किसी ना किसी रूप में ता अभिव्यक्त होनी ही थी। यूं तो चौधरी चरण सिंह भी इमानदारी की वकालत करते हुए इस दुनिया से चले गए। मगर नियती को शायद अन्ना हज़ारे का इंतजार था। गुमनाम शहीदों की एक लम्बी श्रंखला और अंत में मंगल पाण्डेय की शहादत। दूसरी ओर इमानदारी के झंडाबरदारों में सत्येन्द्र दूबे एवं मंजुनाथ जैसे अनेक बलिदान। तब की और आज की परिस्थितियों में अनेक समानताएं हैं। अनेकों ने अंग्रेजों का साथ दिया। उन्हें क्रांतिकारियों के कहर से बचाया। बदले में वे अंग्रेजों के कृपा पात्र बने। आज भी अन्ना की मुहिम को ब्लैकमेलिंग का दर्जा देने वालों की कमी नहीं। गोसंरक्षण के स्वर आज भले ही इतने प्रबल ना हों जितने तब थे, मगर सुने जा रहे हैं। गोशालाओं में जन्मदिन मनाने का रिवाज़ चल पडा है जो एक अच्छा संकेत है। हज़ारे की क्रांति में हिंसा नहीं है, जो सन् सत्तवन की क्रांति से एक सुखद भिन्नता है। तब की क्रांति की प्रतिक्रांति में अंग्रंजों ने कसूरवारों के साथ-साथ बेकसूरों को भी नहीं बख्शा था। इस प्रकार की प्रतिक्रांति का आज के परिप्रेक्ष्य में तो प्रश्न ही नहीं उठता।
इतिहासकार हेनरी मीड ने 1857 की क्रांति के बारे में कहा है: सरकार की राजनीतिक दृष्टि ने भारतीय सैनिकों को विद्रोह के लिए प्रेरित किया। यह बात वर्तमान परिस्थितियों पर भी लागू है। राजनीति काम चलाने, काम निकालने का पर्यायवाची बन कर रह गई है। यह बात अब जनसाधारण को भी खलने लगी है।
अन्ना हज़ारे का सदाचार संग्राम कितना सफल होगा यह इस बात पर निर्भर करेगा कि इसके सिपहसालार कितने संगठित हैं। कितने राष्ट्रवादी हैं। और इस समूची फेहरिस्त में तमाशबीनों की संख्या कितनी है। भारत महाशक्तिशाली राष्ट्र बने, इसके लिए अन्ना संग्राम का सफल होना नितांत आवश्यक है। यह निश्चित है कि वर्तमान की राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव तो होंगे ही। जो कालांतर में राष्ट्र की दशा और दिशा को आमूलचूल रूप से बदल देंगे। जैसा कि सन् 57 की क्रांति के बाद हुआ था।
डॉ. बीर सिंह
जनसंपर्क विभाग
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